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नवापाड़ा स्कूल उपद्रव मामला: न्याय पर भारी पड़ा ‘सौदा’? ₹50,000 लेकर अतिथि शिक्षक ने मामले को किया रफा-दफा

सारंगी (नवापाड़ा):

स्थानीय कन्या हाई संकुल के अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय नवापाड़ा में पिछले दिनों हुए उपद्रव के मामले ने अब एक विवादास्पद मोड़ ले लिया है। शासकीय संपत्ति की तोड़फोड़ और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े इस गंभीर मामले में न्याय की जगह ‘समझौते’ की खबर सामने आ रही है।
क्या है पूरा मामला?
बीते दिनों मुकेश खड़िया नामक व्यक्ति ने नशे की हालत में स्कूल परिसर में जमकर उत्पात मचाया था, जिसमें शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के साथ-साथ भय का माहौल पैदा किया गया था। इस मामले में अब चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि आरोपी पक्ष और पीड़ित अतिथि शिक्षक मानसिंह कटारा के बीच ₹50,000 के लेनदेन के साथ समझौता हो गया है।
कानूनी प्रक्रिया को बाधित करने के आरोप


यह मामला महज एक शिक्षक के निजी मोबाइल के नुकसान का नहीं था, बल्कि सरकारी स्कूल की गरिमा और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा था। आरोप है कि अतिथि शिक्षक मानसिंह कटारा ने एक गंभीर सार्वजनिक अपराध को निजी लाभ के लिए रफा-दफा कर दिया। ग्रामीणों और प्रबुद्ध जनों का कहना है कि शासकीय मामले में इस तरह का आर्थिक समझौता करना न केवल अनैतिक है, बल्कि कानूनी प्रक्रिया को बाधित करने जैसा है।
अधिकारियों के बयानों पर उठे सवाल
मामले की गंभीरता को देखते हुए पूर्व में प्रशासनिक अधिकारियों ने कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया था:
चौकी प्रभारी दीपक देवरे ने कहा था कि आरोपी की तलाश की जा रही है।
खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) देवेंद्र ओझा ने भी जांच के लिए प्राचार्य को मौके पर भेजा था
लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की गई उनके द्वारा बताया गया है की मामला पुलिस प्रशासन के पास है तो इसकी कार्यवाही पुलिस प्रशासन करेगी
अब बड़ा सवाल यह है कि जब मामला पुलिस और शिक्षा विभाग के संज्ञान में था, तो एक अतिथि शिक्षक ने किस अधिकार से शासकीय मर्यादाओं को ताक पर रखकर समझौता किया?
प्रशासन की भूमिका पर नजर
शिक्षा विभाग अब इस बात की पड़ताल कर रहा है कि क्या शासकीय संस्थान में हुई हिंसा और तोड़फोड़ के मामले में कोई कर्मचारी व्यक्तिगत समझौता कर सकता है। क्षेत्र में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या विभाग ऐसे शिक्षक पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करेगा या प्रशासन भी इस समझौते को मौन स्वीकृति देगा?
यह घटना एक गलत नजीर पेश करती है कि सरकारी तंत्र और बच्चों की सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों को पैसों के दम पर दबाया जा सकता है। अब देखना यह है कि उच्चाधिकारी इस ‘सौदेबाजी’ पर क्या कड़ा रुख अपनाते हैं।

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